अध्याय 16

यह तनख़्वाह लैला की आदर्श उम्मीदों के दायरे में नहीं थी, लेकिन इस वक्त उसे बस इतना ही सुकून था कि कम-से-कम नौकरी तो मिली।

घंटे के हिसाब से मिलने वाली रकम वैसे भी ज़्यादातर नए प्रशिक्षकों को मिलने वाली फीस से काफी बेहतर थी।

पूरा एक हफ्ता पढ़ाने के बाद लैला धीरे-धीरे इस दिनचर्या की आदी हो गई। बच्चों...

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